पारंपरिक कौशल और स्थानीय संसाधन ग्रामीण क्षेत्रों में नए उद्यमों की मजबूत नींव बन रहे हैं। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, तकनीक, बेहतर उपकरण और बाजार सहयोग के माध्यम से कारीगरों और उद्यमियों को आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर रहा है।
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के तहत केवीआईसी खादी विकास योजना, ग्रामोद्योग विकास योजना और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम जैसी योजनाएं लागू कर रहा है। इन पहलों का उद्देश्य पारंपरिक व्यवसायों को टिकाऊ कारोबार और आजीविका के साधन में बदलना है।
तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में मार्तंडम हनी प्रोडक्ट्स चलाने वाले टी. अजिन ने मधुमक्खी पालन के अपने अनुभव को शहद आधारित उद्यम में बदल दिया है। उनकी इकाई एगमार्क प्रमाणित शहद के अलावा सूखे मेवों से मिश्रित शहद भी तैयार करती है। अजिन आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तथा अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों के किसानों को आधुनिक मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण भी देते हैं। उन्होंने राज्य, क्षेत्रीय और जिला स्तरीय कार्यक्रमों में भाग लिया है तथा आकाशवाणी और दूरदर्शन के माध्यम से अपना अनुभव साझा किया है।
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इसी तरह बी. सुंदरराज ने खस पर आधारित ग्रामीण उद्यम विकसित किया है। उनकी प्योर हेल्थ हर्बल अगरबत्ती इकाई में अगरबत्ती, हर्बल उत्पाद, खस की अगरबत्ती और खस सांबरानी तैयार किए जाते हैं। वर्ष 2024-25 में ग्रामोद्योग विकास योजना के तहत मिले सहयोग से उन्होंने उत्पादन क्षमता मजबूत की और उत्पादों की श्रृंखला का विस्तार किया।
एम. मुरुगेसन ने केले के रेशे पर आधारित कारोबार विकसित किया है। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत ओम बनाना क्राफ्ट प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से संचालित उनकी इकाई केले के रेशे से सजावटी और उपयोगी वस्तुएं तैयार करती है। उनके काम को केंद्र और राज्य सरकारों से मान्यता भी मिली है।
हनी मिशन से मधुमक्खी पालन को बढ़ावा
ग्रामीण आजीविका के लिए केवीआईसी की प्रमुख पहल हनी मिशन है, जिसे 2017 में किसानों, आदिवासी समुदायों और बेरोजगार युवाओं के बीच वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया था। इसके तहत लाभार्थियों को प्रशिक्षण, मधुमक्खी बक्से, जीवित मधुमक्खी कॉलोनियां और आवश्यक उपकरण दिए जाते हैं।
केवीआईसी के अनुसार, 2017-18 से 2025-26 के बीच देशभर में करीब 2.46 लाख मधुमक्खी बक्से और कॉलोनियां वितरित की गईं। वर्ष 2025-26 में इस पहल से करीब 5,500 मीट्रिक टन शहद उत्पादन में योगदान मिला।
मधुमक्खी पालन का लाभ केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं है। मधुमक्खियां परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिससे कृषि उत्पादकता और जैव विविधता को भी लाभ मिल सकता है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और पूर्वोत्तर राज्यों में मधुमक्खी पालन ग्रामीण समुदायों के लिए आजीविका का साधन बन रहा है।
केवीआईसी पारंपरिक कौशल और स्थानीय संसाधनों को आधुनिक तकनीक, वित्त, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़कर ग्रामीण उद्यमिता को मजबूत कर रहा है। अजिन, सुंदरराज और मुरुगेसन के उदाहरण बताते हैं कि पारंपरिक व्यवसाय आधुनिक उत्पादन के साथ मिलकर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा कर सकते हैं।
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