नए साल 2026 के पहले जुमे के मौके पर कश्मीर के प्रमुख धार्मिक नेता मीरवाइज उमर फारूक ने कहा कि उन्हें अपने घर तक सीमित रखा गया और श्रीनगर की जामिया मस्जिद में नमाज का नेतृत्व करने की अनुमति नहीं दी गई। अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा किए गए वीडियो संदेश में उन्होंने कश्मीर में “थोपे गए सन्नाटे” और देश के अन्य हिस्सों में कश्मीरियों पर हो रहे हमलों का जिक्र किया।
मीरवाइज ने पिछले वर्ष हुए पहलगाम हमले और दिल्ली के रेड फोर्ट ब्लास्ट को याद करते हुए कहा कि इन घटनाओं ने सभी को गहराई से झकझोर दिया। उन्होंने कहा कि इन हमलों की घाटी में सर्वसम्मति से निंदा की गई थी। पहलगाम हमले के बाद सीमा पार तनाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह इस बात की कड़वी याद दिलाता है कि क्षेत्र में शांति कितनी नाजुक बनी हुई है।
जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की समाप्ति का हवाला देते हुए मीरवाइज ने कहा कि 2019 में किए गए एकतरफा बदलावों के बावजूद कश्मीर संघर्ष आज भी क्षेत्र को अस्थिर बनाए हुए है। उनके अनुसार, “युद्ध समाप्त नहीं होते, केवल रोके जाते हैं, और संवाद के लिए कोई तैयार नहीं है।”
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उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीरियों और नई दिल्ली के बीच भरोसे की खाई कम होने के बजाय और गहरी हुई है। मीरवाइज ने चेताया कि “थोपा गया मौन सहमति के रूप में पेश किया जा रहा है,” जबकि एक निर्वाचित केंद्र शासित प्रदेश की सरकार भी खुद को शक्तिहीन बता रही है।
उन्होंने जनसांख्यिकीय बदलावों, संवैधानिक सुरक्षा हटने और कानूनों में बदलाव के कारण पहचान खोने के भय को “अस्तित्व का संकट” बताया। मीरवाइज ने अवामी एक्शन कमेटी और इत्तिहादुल मुस्लिमीन पर प्रतिबंध का जिक्र करते हुए कहा कि शांति और संवाद की आवाज़ उठाने वाला सामाजिक-राजनीतिक दायरा लगभग खत्म कर दिया गया है।
हुर्रियत के संदर्भ सोशल मीडिया से हटाने पर उन्होंने कहा कि यूएपीए के तहत संगठनों पर प्रतिबंध के कारण उनके पास अपनी बात रखने का यही एकमात्र रास्ता बचा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके विचार और विश्वासों में कोई बदलाव नहीं आया है और संवाद का रास्ता ही उनकी नीति बना रहेगा।
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