भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सहकारी बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने और ऋण प्रणाली में अधिक पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण नियामकीय कदमों की घोषणा की है। इनमें शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) के लिए ‘ऑन-टैप’ लाइसेंसिंग प्रक्रिया दोबारा शुरू करना, ग्रामीण सहकारी बैंकों (आरसीबी) के लिए ऋण एकाग्रता जोखिम संबंधी मानकों की समीक्षा तथा ऋण पर ब्याज दर तय करने के नियामकीय ढांचे को सरल और एकरूप बनाना शामिल है।
इन उपायों की घोषणा मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के निर्णय के साथ जारी विकासात्मक और नियामकीय नीतियों के वक्तव्य में की गई। आरबीआई ने बताया कि जनवरी 2026 में लगभग दो दशक के अंतराल के बाद शहरी सहकारी बैंकों की लाइसेंसिंग पर एक चर्चा-पत्र जारी कर हितधारकों से सुझाव मांगे गए थे। प्राप्त सुझावों के आधार पर अब ‘ऑन-टैप’ आधार पर नए यूसीबी लाइसेंस जारी करने का निर्णय लिया गया है।
केंद्रीय बैंक ने कहा कि नई लाइसेंसिंग व्यवस्था से संबंधित मसौदा दिशानिर्देश जल्द ही सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किए जाएंगे। इससे सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ने और वित्तीय समावेशन को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
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आरबीआई ने ग्रामीण सहकारी बैंकों के लिए लागू क्रेडिट मॉनिटरिंग अरेंजमेंट दिशा-निर्देशों की भी समीक्षा का प्रस्ताव रखा है। ये नियम वर्ष 2008 से लागू हैं। केंद्रीय बैंक के अनुसार, पिछले वर्षों में बैंकिंग क्षेत्र और विशेष रूप से सहकारी बैंकिंग में व्यापक संरचनात्मक बदलाव हुए हैं, इसलिए मौजूदा मानकों को समयानुकूल बनाना आवश्यक है।
इसके अलावा, आरबीआई सभी विनियमित संस्थाओं के लिए ऋण पर ब्याज दर निर्धारित करने के ढांचे को सिद्धांत-आधारित दृष्टिकोण से तर्कसंगत बनाने की तैयारी कर रहा है। प्रस्तावित बदलावों के तहत एमसीएलआर और ईबीएलआर प्रणाली से जुड़े परिचालन पहलुओं को सरल बनाया जाएगा तथा ब्याज गणना, डे-काउंट कन्वेंशन और बेंचमार्क रीसेट तिथियों जैसी प्रक्रियाओं में एकरूपता लाई जाएगी।
आरबीआई का मानना है कि इन सुधारों से ऋण मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता बढ़ेगी, मौद्रिक नीति का प्रभाव बेहतर होगा और ग्राहकों के हितों की सुरक्षा मजबूत होगी। आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद इन नियामकीय उपायों की घोषणा की।
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