भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने राज्यसभा नामांकन पत्र को अस्वीकार किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नामांकन अस्वीकृति के मामलों में न्यायालय की सीमित भूमिका होती है और ऐसे मामलों में उचित कानूनी उपाय निर्वाचन आयोग के पास जाना है।
मीनाक्षी नटराजन ने अपने राज्यसभा नामांकन को रद्द किए जाने के खिलाफ शीर्ष अदालत में याचिका दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि उनके नामांकन को वैध माना जाए और अस्वीकृति के निर्णय को रद्द किया जाए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि क्या ऐसा कोई न्यायिक निर्णय है जिसमें अदालत ने नामांकन पत्रों की अस्वीकृति के मामलों में हस्तक्षेप किया हो। अदालत ने कहा कि इस प्रकार के मामलों में न्यायिक दखल बहुत सीमित होता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि जब किसी उम्मीदवार का नामांकन पत्र खारिज हो जाता है, तो उसके लिए एकमात्र वैधानिक रास्ता निर्वाचन आयोग के समक्ष अपील करना होता है। अदालत ने दोहराया कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों में न्यायपालिका सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करती।
इस फैसले के बाद मीनाक्षी नटराजन को कोई राहत नहीं मिली और उनकी याचिका खारिज कर दी गई। यह मामला चुनावी नामांकन प्रक्रिया और न्यायिक अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य के ऐसे मामलों के लिए भी दिशा-निर्देश माना जा सकता है।
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