केंद्र और राज्य सरकारें अनजाने या जानबूझकर ऐसी स्थिति में फँसती जा रही हैं, जहाँ उनकी वित्तीय स्वतंत्रता लगातार सीमित होती जा रही है। बीते कुछ वर्षों में लागू की गई कर कटौतियों और कर ढांचे में बदलावों ने सरकारों की खर्च करने की क्षमता को काफी हद तक संकुचित कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कदमों को वापस लेना आसान नहीं होगा, इसलिए राजस्व की यह कमी लंबे समय तक बनी रह सकती है।
यह प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ी। सबसे पहले वर्ष 2019 में कॉरपोरेट टैक्स की दरों में बड़ी कटौती की गई, जिसका उद्देश्य निवेश को प्रोत्साहन देना था। इसके बाद केंद्रीय बजट 2025-26 में व्यक्तिगत आयकर स्लैब में पुनर्गठन किया गया, जिससे करदाताओं को राहत तो मिली, लेकिन सरकारी खजाने पर दबाव भी बढ़ा। अब वस्तु एवं सेवा कर (GST) स्लैब के युक्तिकरण ने अप्रत्यक्ष कर संग्रह को भी प्रभावित किया है।
दिलचस्प बात यह है कि पिछले एक दशक में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर आधार में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। अधिक लोग और संस्थान कर के दायरे में आए हैं, डिजिटल प्रणाली से कर संग्रह में पारदर्शिता भी बढ़ी है। इसके बावजूद इन नीतिगत फैसलों का कुल प्रभाव यह रहा है कि सरकारी राजस्व अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ पाया।
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इसका सीधा असर सरकारी खर्च पर पड़ रहा है। बुनियादी ढांचे, सामाजिक कल्याण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में बढ़ती जरूरतों के बावजूद सरकारों को खर्च पर लगाम लगानी पड़ रही है। भले ही सार्वजनिक मंचों पर बड़े पैमाने पर खर्च के दावे किए जा रहे हों, लेकिन वास्तविकता यह है कि वित्तीय सीमाएँ सरकारों को विवश कर रही हैं।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि राजस्व बढ़ाने के वैकल्पिक और टिकाऊ उपाय नहीं खोजे गए, तो यह स्थिति केंद्र और राज्यों दोनों के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकती है।
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