संसद के मानसून सत्र से पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में विपक्षी दलों ने बागी सांसदों को आमंत्रित किए जाने के विरोध में बैठक का बहिष्कार कर दिया। विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के उस फैसले पर आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और शिवसेना (यूबीटी) के बागी सांसदों को बैठक में शामिल होने की अनुमति दी थी।
यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के विलय को मंजूरी दी। इसके अलावा, टीएमसी के 20 बागी सांसदों को अलग बैठने की व्यवस्था भी दी गई। ये सांसद एक छोटे और कम चर्चित दल एनसीपीआई में शामिल हो चुके हैं।
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने विपक्ष के फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि सभी विपक्षी दलों ने मिलकर सर्वदलीय बैठक से बाहर निकलने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा, "विपक्ष ने टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) के बागी सांसदों को लेकर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले के विरोध में बैठक का बहिष्कार किया है।"
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टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, झारखंड मुक्ति मोर्चा, आम आदमी पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, वाम दल और शिवसेना (यूबीटी) समेत सभी विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर एकजुट होकर विरोध दर्ज कराया।
महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि जिस एनसीपीआई को मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल नहीं माना जाता, उसके आधार पर टीएमसी की संख्या को 28 सांसदों के रूप में दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि इन 20 बागी सांसदों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं अभी लंबित हैं और उनके विलय को लोकसभा अध्यक्ष ने मंजूरी नहीं दी है।
उन्होंने कहा कि 91वें संविधान संशोधन के बाद अलग गुट बनाने का कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए इन सांसदों को बैठक में आमंत्रित करने का आधार स्पष्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने अपना विरोध दर्ज कराने के लिए बैठक से बाहर निकलने का फैसला किया।
विपक्ष के इस कदम से संसद के मानसून सत्र से पहले राजनीतिक टकराव और बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।
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