भारत ऑनलाइन धन हस्तांतरण के मामले में तेजी से डिजिटल होता देश है। लोग नकदी का इस्तेमाल कम कर रहे हैं और अलग-अलग यूपीआई ऐप के जरिए भुगतान कर रहे हैं। सब्जी विक्रेता से लेकर बड़े कारोबारी तक, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस ने रोजमर्रा के लेनदेन को काफी आसान बना दिया है। हालांकि, वर्षों से जारी शून्य-शुल्क व्यवस्था में बदलाव की संभावना सामने आई है। सरकार कथित तौर पर कुछ यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने की व्यवस्था पर विचार कर रही है।
1. प्रस्तावित कानून में क्या बदलाव होगा?
सरकार भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम में संशोधन करना चाहती है, ताकि बैंकों को यूपीआई समेत कुछ डिजिटल भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लेने की कानूनी अनुमति मिल सके। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि तुरंत शुल्क लागू हो जाएगा। संशोधन केवल सरकार को जरूरत पड़ने पर शुल्क लागू करने का अधिकार देगा।
2. कितना हो सकता है यूपीआई शुल्क?
एक प्रस्ताव के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.3 से 0.5 प्रतिशत एमडीआर लगाया जा सकता है। इसका असर संभवतः उन दुकानदारों और कारोबारियों पर पड़ेगा जिनका सालाना कारोबार 1.5 करोड़ रुपये से अधिक है। शुल्क को कारोबार के आकार से जोड़ने या इसकी अधिकतम सीमा तय करने पर भी विचार हो रहा है, लेकिन अभी कुछ अंतिम नहीं है।
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3. सरकार एमडीआर पर विचार क्यों कर रही है?
भुगतान कंपनियों का कहना है कि लंबे समय तक बिना शुल्क वाली व्यवस्था चलाना आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं है। राजस्व के जरिए डिजिटल बुनियादी ढांचे और सुरक्षा में लगातार निवेश किया जा सकता है।
4. यूपीआई शुल्क कौन देगा?
प्रस्ताव लागू होने पर शुल्क कारोबारियों को देना होगा, ग्राहकों को नहीं। छोटे किराना दुकानदारों और छोटे कारोबारियों पर शुल्क लगने की संभावना कम है।
5. क्या आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं को भुगतान करना होगा?
यदि प्रस्ताव लागू होता है तो इसका मुख्य असर बड़े कारोबार और अधिक मूल्य वाले लेनदेन पर पड़ेगा। 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन यूपीआई के कुल लेनदेन का करीब 5 प्रतिशत हैं, लेकिन इनका कुल मूल्य लगभग 65 प्रतिशत है। रोजमर्रा के छोटे भुगतान मुफ्त रहने की संभावना है, हालांकि दुकानदार चाहें तो लागत ग्राहकों पर डाल सकते हैं।
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