केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एयर प्यूरीफायर पर जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) घटाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) का विरोध किया है। केंद्र ने कहा है कि कर से जुड़े मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप संविधान के तहत अनुमेय नहीं है और यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा।
यह याचिका एयर प्यूरीफायर को “चिकित्सीय उपकरण” (Medical Device) के रूप में वर्गीकृत करने और उन पर लगने वाले 18 प्रतिशत जीएसटी को घटाकर 5 प्रतिशत करने की मांग करती है। केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि यह स्थापित कानून है कि अदालतें आर्थिक नीति और राजकोषीय ढांचे से जुड़े मामलों में स्वयं को संवैधानिक रूप से निर्धारित निर्णयकर्ताओं के स्थान पर नहीं रख सकतीं।
केंद्र ने कहा कि यदि अदालत जीएसटी दरों में बदलाव, जीएसटी परिषद की बैठक बुलाने या किसी विशेष निर्णय को अपनाने का निर्देश देती है, तो यह जीएसटी परिषद के अधिकार क्षेत्र में सीधा हस्तक्षेप होगा। संविधान ने स्पष्ट रूप से कर नीति से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार जीएसटी परिषद को दिया है और अदालत का ऐसा कदम शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा।
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यह मामला शुक्रवार (9 जनवरी 2026) को मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। याचिका अधिवक्ता कपिल मदान द्वारा दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि दिल्ली में गंभीर वायु प्रदूषण के कारण उत्पन्न “अत्यंत आपात स्थिति” को देखते हुए एयर प्यूरीफायर को विलासिता की वस्तु नहीं माना जा सकता।
अदालत ने पहले केंद्र से सवाल किया था कि राष्ट्रीय राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में बिगड़ती वायु गुणवत्ता को देखते हुए आम जनता के लिए एयर प्यूरीफायर सस्ते बनाने के लिए जीएसटी दर क्यों नहीं घटाई जा सकती। अदालत ने जीएसटी परिषद को इस मुद्दे पर जल्द बैठक कर कर में कटौती या उसे समाप्त करने पर विचार करने का निर्देश भी दिया था।
हालांकि, केंद्र ने अपने हलफनामे में याचिका को “प्रेरित” और “छलपूर्ण प्रयास” बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य जनहित नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा संस्थाओं को नियामकीय और व्यावसायिक लाभ पहुंचाना है। केंद्र ने दलील दी कि एयर प्यूरीफायर को मेडिकल डिवाइस घोषित करने से बाजार में प्रतिस्पर्धा सीमित हो सकती है। इसलिए यह याचिका खारिज किए जाने योग्य है।
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