नया साल 2026 देश की राजनीति और शासन की दिशा तय करने वाले कई अहम घटनाक्रमों का साक्षी बनने जा रहा है। बड़े राज्यों में होने वाले उच्च-दांव विधानसभा चुनावों से लेकर विवादास्पद विधायी प्रस्तावों और प्रमुख दलों में नेतृत्व परिवर्तन तक, यह वर्ष सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित कई राजनीतिक खिलाड़ियों के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
प्रमुख चुनाव
2024 के लोकसभा चुनावों में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन के बाद भाजपा ने फिर से अपनी राजनीतिक रफ्तार हासिल की है। झारखंड को छोड़ दें तो दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में उसने विधानसभा चुनाव जीते हैं। जम्मू-कश्मीर में सरकार भले ही नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने बनाई, लेकिन जम्मू क्षेत्र में भाजपा के मजबूत प्रदर्शन ने उसकी सांगठनिक ताकत को दिखाया।
विपक्ष के लिए आने वाला चुनावी चक्र बेहद अहम है। इसकी पहली परीक्षा 15 जनवरी को मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव होंगे, जो देश की सबसे समृद्ध नगर निकाय होने के कारण प्रतीकात्मक और प्रशासनिक दोनों रूप से महत्वपूर्ण हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में 2026 की पहली छमाही में विधानसभा चुनाव होंगे।
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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला होगा। तमिलनाडु में डीएमके-एआईएडीएमके की पारंपरिक द्विध्रुवीय राजनीति में अभिनेता विजय की एंट्री ने अनिश्चितता बढ़ा दी है। असम में भाजपा अपने सहयोगियों के साथ मजबूत स्थिति में है, जबकि कांग्रेस व्यापक गठबंधन के बावजूद चुनौतियों से घिरी है। केरल में यदि वाम मोर्चा हारता है तो लगभग पांच दशकों बाद देश में कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं होगा।
विधायी प्रस्ताव और अन्य मुद्दे
2026 में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर बहस तेज हो सकती है। इसके लिए संविधान संशोधन विधेयकों पर संसद में तीखी चर्चा और राजनीतिक सौदेबाजी की संभावना है। इसके अलावा 16 साल बाद होने वाली डिजिटल जनगणना और इसके बाद प्रस्तावित परिसीमन भी राजनीतिक तनाव बढ़ा सकते हैं।
भाजपा में नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की तैनाती, नक्सलवाद के खात्मे की समयसीमा और राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव भी 2026 के राजनीतिक एजेंडे को और अहम बनाते हैं।
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