वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें इस समय अपेक्षाकृत कम बनी हुई हैं। विशेषज्ञों और भारत के तेल आयात आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, यदि भारत मौजूदा हालात में रूसी तेल के आयात से दूरी बनाकर अमेरिका जैसे अन्य देशों से अधिक तेल खरीदने का निर्णय लेता है, तो इसका देश की वित्तीय स्थिति पर बड़ा नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
आंकड़े बताते हैं कि जहां अमेरिका से आयात किए जाने वाले तेल पर भारत को जो प्रीमियम चुकाना पड़ता है, वह पिछले तीन वर्षों में लगभग स्थिर बना हुआ है, वहीं रूस से मिलने वाली छूट (डिस्काउंट) में काफी कमी आई है। इसका अर्थ यह है कि रूसी तेल अब पहले जितना सस्ता नहीं रहा, जितना यूक्रेन युद्ध के शुरुआती दौर में हुआ करता था।
‘The Indian Witness’ द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार, नवंबर 2025 में—जो कि उपलब्ध ताजा आंकड़ों वाला महीना है—भारत ने रूस से कच्चा तेल 482.7 डॉलर प्रति टन की दर से आयात किया। इसी अवधि में अमेरिका से आयात किए गए कच्चे तेल की कीमत 523.3 डॉलर प्रति टन रही। कुल मिलाकर नवंबर 2025 में भारत ने औसतन 498.8 डॉलर प्रति टन की दर से कच्चे तेल का आयात किया।
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विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों से मिलने वाले तेल की कीमतों के अंतर में अब पहले जितना बड़ा फासला नहीं रह गया है। ऐसे में यदि भारत रणनीतिक या कूटनीतिक कारणों से रूसी तेल की हिस्सेदारी घटाकर अमेरिकी या अन्य स्रोतों से तेल आयात बढ़ाता है, तो इससे सरकारी खजाने पर सीमित दबाव ही पड़ेगा।
हालांकि, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति की निरंतरता और दीर्घकालिक अनुबंध जैसे पहलू अभी भी भारत की तेल आयात नीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे। मौजूदा परिस्थितियों में कम वैश्विक कीमतें भारत को आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने का अवसर प्रदान कर रही हैं, जिससे देश की ऊर्जा रणनीति अधिक लचीली बन सकती है।
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