नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही में बरी किया जाना, उससे जुड़े आपराधिक मामले को स्वतः समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 6 जनवरी को दिए गए एक फैसले में की।
शीर्ष अदालत ने कहा कि अनुशासनात्मक जांच और आपराधिक मुकदमा दो स्वतंत्र प्रक्रियाएं हैं, जिनका उद्देश्य, प्रकृति और प्रमाण का मानक अलग-अलग होता है। अनुशासनात्मक जांच में नियोक्ता यह तय करता है कि लगाए गए आरोप सिद्ध हुए हैं या नहीं और यदि हुए हैं तो किस प्रकार की सजा दी जानी चाहिए। यह निर्णय ‘संभावनाओं के संतुलन’ के आधार पर लिया जाता है।
वहीं, आपराधिक मामले में किसी कृत्य की आपराधिकता को संदेह से परे, ठोस साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध करना आवश्यक होता है। अदालत ने कहा कि दोनों प्रक्रियाएं अलग-अलग संस्थाओं द्वारा, अलग नियमों के तहत और अलग साक्ष्यों के आधार पर तय की जाती हैं, इसलिए एक का निष्कर्ष दूसरे पर बाध्यकारी नहीं हो सकता।
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सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि यदि अनुशासनात्मक जांच में आरोप सिद्ध नहीं हो पाए, तो आपराधिक मुकदमे में उन्हें सिद्ध करना असंभव होगा। अदालत ने कहा कि यदि किसी एक मामले में साक्ष्य सही ढंग से पेश नहीं किए गए, तो उसका असर दूसरे स्वतंत्र मामले पर नहीं पड़ सकता।
यह फैसला कर्नाटक लोकायुक्त, बागलकोट द्वारा दायर अपील पर सुनाया गया। इससे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक कार्यपालक अभियंता के खिलाफ भ्रष्टाचार के आपराधिक मामले को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि विभागीय जांच में उसे बरी कर दिया गया है। आरोप थे कि अभियंता ने ठेकेदार से पांच बिल पास करने के बदले प्रति बिल दो हजार रुपये की रिश्वत मांगी और स्वीकार की।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें केवल विभागीय बरी होने के आधार पर आपराधिक कार्यवाही समाप्त की जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमा जारी रहेगा और यदि दोष सिद्ध होता है, तो सेवा नियमों के अनुसार उसके परिणाम होंगे।
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