सुप्रीम कोर्ट ने झूठे विवाह के वादे पर दुष्कर्म के एक मामले में लंदन निवासी एनआरआई आरोपी को अग्रिम जमानत प्रदान की है। यह मामला मुंबई की एक महिला अधिवक्ता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर उसके साथ दुष्कर्म किया। शीर्ष अदालत ने इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें अक्टूबर 2025 में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने आरोपी द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह राहत दी। आरोपी पेशे से सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र से जुड़ा है और वर्तमान में लंदन में रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी को अग्रिम जमानत दी जा सकती है।
हालांकि, अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जब आरोपी भारत लौटे, तो उसे जांच एजेंसियों के साथ पूर्ण सहयोग करना होगा। पीठ ने कहा कि जांच में सहयोग करना अग्रिम जमानत की एक आवश्यक शर्त है और आरोपी को किसी भी प्रकार से जांच प्रक्रिया में बाधा नहीं डालनी चाहिए।
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यह मामला भारतीय न्याय संहिता की नई व्यवस्था यानी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत अग्रिम जमानत से भी जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसने हाई कोर्ट के आदेश को पलटते हुए आरोपी को राहत दी और यह स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले में तथ्यों की गहन जांच आवश्यक है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस आदेश से यह संदेश जाता है कि अदालतें झूठे विवाह के वादे से जुड़े दुष्कर्म मामलों में भी परिस्थितियों, साक्ष्यों और आरोपी के आचरण को ध्यान में रखते हुए संतुलित फैसला देती हैं। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि पीड़िता के अधिकारों और जांच की निष्पक्षता से कोई समझौता न हो।
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