दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके शारीरिक आत्मनिर्णय (बॉडिली इंटीग्रिटी) का उल्लंघन है और इससे उसका मानसिक आघात और बढ़ता है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने उस मामले में की, जिसमें एक अलग रह रही पत्नी को अपने 14 सप्ताह के भ्रूण का चिकित्सकीय गर्भपात कराने पर पति द्वारा दर्ज कराए गए आपराधिक मामले से मुक्त किया गया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक मतभेद की स्थिति में गर्भपात कराने के महिला के अधिकार को मान्यता दी जानी चाहिए। न्यायमूर्ति ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता पत्नी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 312 (गर्भपात कराना) के तहत कोई अपराध नहीं बनता। अदालत ने कहा कि चुनाव की स्वतंत्रता व्यक्तिगत स्वायत्तता का अभिन्न हिस्सा है और प्रजनन पर नियंत्रण हर महिला की मूल आवश्यकता और अधिकार है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम के तहत गर्भपात के लिए पति की अनुमति आवश्यक नहीं है। इस कानून का मूल उद्देश्य महिला के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को होने वाली “गंभीर क्षति” से बचाना है।
और पढ़ें: आईआरसीटीसी घोटाला मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद की याचिका पर CBI से जवाब मांगा
अपने 6 जनवरी 2026 के फैसले में कोर्ट ने कहा कि यदि कोई महिला गर्भ जारी नहीं रखना चाहती, तो उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करना उसकी शारीरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है और इससे मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों और एमटीपी अधिनियम की धारा 3 का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक कलह की स्थिति में गर्भपात कराना अपराध नहीं माना जा सकता।
महिला ने दलील दी थी कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त उसकी प्रजनन स्वायत्तता और निजता के अधिकार को आपराधिक बना दिया गया है। वहीं, पति ने तर्क दिया कि गर्भपात के समय दोनों साथ रह रहे थे, इसलिए वैवाहिक कलह नहीं थी। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि वैवाहिक मतभेद का अर्थ केवल कानूनी अलगाव या मुकदमेबाजी तक सीमित नहीं हो सकता।
कोर्ट ने समाज की “कठोर पुरुषप्रधान वास्तविकता” की ओर इशारा करते हुए कहा कि अनचाही गर्भावस्था का बोझ अंततः महिला को ही उठाना पड़ता है, जिससे सामाजिक, आर्थिक और मानसिक समस्याएं पैदा होती हैं।
और पढ़ें: पत्नी के अंतरिम भरण-पोषण की राशि गणितीय सटीकता से तय नहीं की जा सकती: दिल्ली हाईकोर्ट