शिवसेना के दो गुटों के बीच चल रहे विवाद को लेकर मंगलवार को सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट ने भारतीय निर्वाचन आयोग की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। शिवसेना (यूबीटी) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत के समक्ष दलील पेश करते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर कार्रवाई की।
कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि निर्वाचन आयोग को चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश के पैराग्राफ 15 के तहत अधिकार क्षेत्र तभी प्राप्त होता है, जब किसी राजनीतिक दल में वास्तविक विभाजन हुआ हो। उनका कहना था कि आयोग को पहले यह निर्धारित करना जरूरी था कि पार्टी में वैध रूप से विभाजन हुआ है या नहीं।
शिवसेना में विभाजन के बाद पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों गुटों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। एक ओर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाला शिवसेना (यूबीटी) गुट है, जबकि दूसरी ओर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला शिवसेना गुट है।
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विवाद के दौरान दोनों पक्षों ने शिवसेना के संगठन, विधायकों और सांसदों के समर्थन तथा पार्टी के वास्तविक नियंत्रण को लेकर अपने-अपने दावे किए हैं। चुनाव आयोग ने पहले एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया था।
उद्धव ठाकरे गुट इस निर्णय को लगातार चुनौती देता रहा है। मंगलवार की सुनवाई में कपिल सिब्बल ने विशेष रूप से चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र और पैराग्राफ 15 के इस्तेमाल के कानूनी आधार पर जोर दिया।
उनकी दलील का मुख्य आधार यह था कि केवल विधायकों या सांसदों की संख्या के आधार पर किसी राजनीतिक दल के संगठनात्मक नियंत्रण का फैसला नहीं किया जा सकता। पार्टी के संविधान और संगठनात्मक ढांचे को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
अब अदालत में आगे होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। दोनों गुटों की दलीलें पूरी होने के बाद अदालत यह तय करेगी कि चुनाव आयोग द्वारा शिवसेना विवाद में अपनाई गई प्रक्रिया और उसके अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कानूनी रूप से उचित था या नहीं।
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