पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) को अक्सर इस बात का उदाहरण माना जाता है कि किसी खेल संस्था का संचालन कैसे नहीं किया जाना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों के दौरान लगातार विवादों और राजनीतिक बयानबाजी ने यह धारणा मजबूत की है कि बोर्ड क्रिकेट से ज्यादा राजनीति में उलझा हुआ है। इस बीच मैदान पर टीम का प्रदर्शन भी लगातार गिरता दिख रहा है।
हाल ही में टी20 विश्व कप से पहले पाकिस्तान ने कई विवाद खड़े किए। कभी कोलंबो में खेलने पर सहमति जताई गई, तो कभी खेलने से इनकार किया गया। कभी बांग्लादेश के समर्थन की बात कही गई, तो कभी पूरे टूर्नामेंट का बहिष्कार करने की धमकी दी गई। अंततः बोर्ड ने पीछे हटते हुए 15 फरवरी को कोलंबो में भारत के खिलाफ मैच खेलने की पुष्टि कर दी। इससे सवाल उठता है कि इस पूरे विवाद की जरूरत क्या थी।
यह पहली बार नहीं है जब ऐसा हुआ हो। 2023 वनडे विश्व कप से पहले पाकिस्तान ने भारत जाने से इनकार कर दिया था, लेकिन आईसीसी के सख्त रुख के बाद उन्हें अंततः टूर्नामेंट में भाग लेना पड़ा। 2025 चैंपियंस ट्रॉफी से पहले भी इसी तरह का विवाद हुआ, जब भारत ने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया और आखिरकार पीसीबी को भारत के मैच यूएई में कराने पर सहमत होना पड़ा।
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एशिया कप के बाद ट्रॉफी विवाद भी सामने आया, जब रिपोर्ट के अनुसार पीसीबी प्रमुख मोहसिन नकवी ने ट्रॉफी भारत को सौंपने से इनकार कर दिया। इस तरह की घटनाएं दिखाती हैं कि बोर्ड का ध्यान क्रिकेट के विकास से ज्यादा राजनीतिक मुद्दों पर है।
मैदान पर प्रदर्शन भी चिंता का विषय है। पाकिस्तान 2023 वनडे विश्व कप, 2024 टी20 विश्व कप और 2025 चैंपियंस ट्रॉफी में प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि बोर्ड को राजनीति से हटकर क्रिकेट पर ध्यान देना चाहिए।
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