बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश के अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय की सुरक्षा और भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। वर्ष 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद शुरू हुए राजनीतिक बदलाव के साथ ही सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। इसी कारण इन चुनावों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों की खास नजर है।
बांग्लादेश की कुल आबादी में हिंदू समुदाय लगभग 8 प्रतिशत है, लेकिन चुनाव से पहले के महीनों में इस समुदाय के खिलाफ हमलों और हिंसा की कई घटनाएं सामने आई हैं। इन घटनाओं में मॉब लिंचिंग, हत्या, संपत्ति को नुकसान और धार्मिक स्थलों पर हमले शामिल हैं। इससे अल्पसंख्यक समुदायों में भय और असुरक्षा का माहौल गहरा गया है।
हाल के महीनों में कई गंभीर घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है। दिसंबर 2025 में एक युवा हिंदू गारमेंट्स कर्मचारी दीपु चंद्र दास को ईशनिंदा के आरोप में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला और बाद में उसका शव जला दिया गया। इसी तरह, रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच 45 दिनों में कम से कम 15 हिंदू लोगों की हत्या हुई। एक अन्य मामले में हिंदू व्यवसायी लिटन चंद्र घोष को चाकू मारकर जला दिया गया, जिससे बाद में उनकी मौत हो गई।
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अल्पसंख्यक अधिकार समूहों का कहना है कि पिछले एक साल में 500 से अधिक सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें हत्या और यौन हिंसा के मामले भी शामिल हैं। इन घटनाओं ने अल्पसंख्यकों के बीच भय का माहौल पैदा कर दिया है और चुनाव को उनके लिए विश्वास और सुरक्षा की परीक्षा बना दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव परिणाम तय करेंगे कि भविष्य में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी और सरकार सांप्रदायिक तनाव से कैसे निपटेगी। शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव बांग्लादेश में स्थिरता और समावेशी समाज की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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