अप्रैल 2025 में संस्कृति मंत्रालय को एक ऐसा डोज़ियर मिला, जिसने सरकार और इतिहास से जुड़े विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी। इसमें बताया गया कि उत्तर प्रदेश के पिपरहवा से 1898 में खुदाई के दौरान मिले 349 बहुमूल्य रत्न, जो भगवान बुद्ध के अवशेषों के साथ खोजे गए थे, हांगकांग में नीलाम किए जाने वाले हैं। इन रत्नों की नीलामी सोथबीज़ हांगकांग में प्रस्तावित थी और अनुमानित कीमत लगभग 10 करोड़ डॉलर बताई गई थी। इसके बाद अगले तीन महीनों तक भारत सरकार ने हर संभव प्रयास किया ताकि ये अमूल्य धरोहर वापस देश लाई जा सके।
फरवरी 2025 में तिरुवनंतपुरम स्थित अपने घर पर लैपटॉप ब्राउज़ करते हुए सोहेब वहाब की नजर सोथबीज़ हांगकांग की वेबसाइट पर पड़ी। वहां “भारत से दुर्लभ रत्न” शीर्षक के तहत इन ऐतिहासिक रत्नों की नीलामी की जानकारी दी गई थी। नीलामी सूची में लिखा था कि 1898 में विलियम क्लैकस्टन पेप्पे ने उत्तर भारत के पिपरहवा में इन रत्नों की खोज की थी, जहां ये ऐतिहासिक बुद्ध के अस्थि-अवशेषों के साथ कलशों में दबे मिले थे। इसे दुनिया की सबसे असाधारण पुरातात्विक खोजों में से एक माना जाता है।
ये रत्न एक “परिवार के निजी संग्रह” का हिस्सा बताए गए थे और 7 मई को हांगकांग में नीलामी के लिए रखे जाने थे। जैसे ही यह जानकारी सामने आई, भारत सरकार हरकत में आई। संस्कृति मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और कानूनी विशेषज्ञों ने मिलकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक और कानूनी प्रयास शुरू किए।
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लगातार दबाव, संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के चलते अंततः यह सुनिश्चित किया गया कि पिपरहवा के ये ऐतिहासिक रत्न भारत वापस लाए जाएं। यह केवल धरोहर की वापसी नहीं थी, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत की पुनः प्राप्ति का एक ऐतिहासिक क्षण था।
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